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jindgi se guftgoo
जिंदगी से गुफ्तगू के कुछ लम्हे काग़ज़ पे उतारे है कुछ लम्हे अपने खुद के और कुछ परायों से उधार माँगे है
सुनहरे पत्ते उड़ चले सुनहरी छा ओं में जाने कब कहा गिरे किसकी राह में
चलता हूँ अनजान राहों पर, टूटता हूँ बिखरता हूँ फिर भी कण कण जोड़ कर पुन ह अपना एक अक्स बनाता हूँ फिर से टूट कर बिखर जाने के लिए
चन्द काँच के टुकड़ो को मुट्ठी में दबा के देखिए लहू रिसने लगे जब तब मुस्कुरा के देखिए
रंजिशे ही सही, दिल दुखाने के लिए आ आ फिर मुझे छोड़कर जाने के लिए आ
जबसे मेरे आगन में थोड़ा सा उजाला हुआ है तबसे हर शख्स यही कहता है की दिन डूबने वाला हुआ है
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