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bharm
यह कविता किसी और के लिए बहुत पहले लिखी थी. आज बहुत समय बाद जब पढ़ी तो इसमे कुछ जोड़ने को जी चाहा और आप सब के साथ शेयर करने को , तो पेश है.................
तब................ दूर तक तारों से पटा नभ शीतल प्रकाश से भरा धरती का गर्भ क्षितिज के पास वो रंगों के वास( इंद्रधनुष) गगन के हिंडोले में घटा चाँद का रास वर्षामयी मेघों का भीषण नाद भावविभोर मयूर का मदमस्त प्रणय राग व्रक्षों के पात का वो प्यार भरा चुंबन फूलों सी खिली धरती पा वो आलिंगन पर यह क्या, हाथ से मय का प्याला कब छूट गया जीवन था एक सुखद भ्रम मात्र जाने कब टूट गया
और अब..................
आज फिर मयकदे से पहचान बनाई है और इस बार मय ने ऐसी चढ़ाई है की सुरूरे जिंदगी उतरता नही साकी थोड़ी और की प्यास है क्या करे की, मन भरता नही साकी
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